सावित्रीबाई फुले: शिक्षिका ही नहीं 1क्रांति की ज्वाला थीं,big story

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जब भी देश में महिलाओं की शिक्षा की बात होती है तो स्वतः माता सावित्रीबाई फुले का नाम स्मरण हो जाता है.अंधविश्वास और कुरीतियों के अंधकार में डूबा भारतीय समाज को शिक्षा और ज्ञान की रोशनी देने वाली सावित्रीबाई फुले की आज 189 वीं जयंती है.21वीं सदी में भी भारत की महिलाओं को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पूर्ण अधिकार नहीं मिले है,जरा सोचो 18 वीं 19 वीं सदी में क्या हाल रहा 0होगा.उस समय समाज में अंधविश्वास और कुरीतियों के खिलाफ महात्मा ज्योतिबाफुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई ने मिलकर संघर्ष किया.और नवचेतना जगाई.

सावित्रीबाई फुले : शिक्षिका ही नहीं क्रांति की ज्वाला थीं,big story
क्रांतिकारी प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई फुले का जीवन परिचय:

इनका जन्म 3 जनवरी सन1831को महाराष्ट्र में हुवा था.इनके पिता खन्दोजी नेवसे आउर माँ-लक्ष्मी थी.उस समय बालविवाह की प्रथा थी इसलिए जब वो मात्र 9 वर्ष की थीं उनका विवाह 1940 में ज्योतिबा फुले के साथ हो गया .जो उम्र बच्चों के विद्यालय जाने की होती है,उस उम्र में सादी हो गयी.लेकिन पति ज्योतिबाराव फुले ने सावित्री को घर पर ही शिक्षा दी.आगे चलकर सावित्रीबाई देश की प्रथम महिला शिक्षिका बनीं.पति और पत्नी के कठिन संघर्ष से दलितों,महिलाओं और गरीबों के लिए महाराष्ट्र में शिक्षा के द्वार खुले.

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समाज ने उछाला कीचड़ :वो डंटी रही हारी नहीं

वे स्कूल जाती थीं, तो कट्टर लोग उन पर पत्थर मारते थे. उन पर कीचड़ और गंदगी डाल देते थे. 189 वर्ष पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम समझा जाता था तो सोचें उन्होंने स्कूल कितनी सामाजिक मुश्किलों से खोला होगा.

सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं और परिवर्तनकारी हैं. हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया. जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे.सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं. अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं.

विद्यालय की स्थापना:

3 जनवरी 1848 में पुणे में अपने पति महात्म्मा ज्योतििबाराव की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने महिलोओ के लिए एक विद्यालय की स्थापना की.एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार ने इन्हे सम्मानित भी किया. एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती. लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी. सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया, वह भी पुणे जैसे शहर में.आज औरतों को उन्हें आदर्श मानना चाहिए

ऐसी थी हिंदुत्व की सामाजिक व्यवस्था:

जिस वक्त भारत की रूढ़िवादी सामाजिक परंपराओं ने समाज को आगे बढ़ने के रास्ते बंद कर रखे थे.उस दौर में एक महिला द्वारा शिक्षा की ज्योति जलाना अपने आप में एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी और जोखिम भरा कार्य था.इस जोखिम को उठाने वाली वीरांगना थी माता सावित्रीबाई फुले.सावित्रीबाई फुले द्वारा किस तरह महिलाओं के लिए स्कूल खोलकर शिक्षा का प्रचार किया और उनको इस काम के लिए कितना खतरा मोल लेना पड़ा,इसको लिखने से पहले हिंदुस्तान के शास्त्रों से निकले  उस जहर को समझना जरूरी है , जो समाज के एक बड़े समुदाय को शिक्षा से वंचित रखता है,समता से वंचित रखता है और स्वतंत्रता से वंचित रखता है.

  मनुस्मृति काल से लेकर 18 वीं 19वीं सदी तक  तथाकथित शूद्रों(वर्णव्यवस्था के क्रम में) तथा महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था.यहां तक कि वेद,पुराण और शास्त्रों को सुनने तक पर कठोर दंड(कान में शीसा पिघलाकर) था.(यद्यपि इनमें पढ़ने और सुनने लायक कुछ भी नहीं था.जिसको पढ़कर और सुनकर समाज और देश का विकास हो.असमानता,घृणा भेदभाव, अंधविश्वास, कुप्रथाओं और रूढ़िवादी विचारों से भरे शास्त्रों को पढ़कर और सुनकर होना भी कुछ नहीं था.

इन कुप्रथाओं पर की चोट:

महात्मा ज्योतिबाराव फुले ने ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना की .महात्मा ज्योतिबाराव फुले और माता  सावित्रीफुले ने मिलकर बालविवाह का विरोध किया,सती प्रथा का विरोध किया तथा विधवाओं को शादी करने के अधिकार की लड़ाई लड़ी.दुनियां में बिरले ही दम्पति ऐसे होंगे जिन्होंने कुरीतियों की लड़ाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया.

भारत की ये विडंबना है कि बाबा साहेब अंबेडकर, पेरियार, ज्योतिबाफुले ,सावित्रीबाई फुले,कांशीराम,के आर नारायणन,मायावती जैसे महान परिवर्तनकरियों को सिर्फ दलितों के ही मसीहा माना जाता है.जबकि सच्चाई ये है कि इन सबने संपूर्ण हिंदुस्तान और हिंदुत्व में फैली गंदगी को मिटाने का काम किया.स्वच्छ भारत तभी तो बनेगा जब समाज पहले स्वच्छ होगा.

Google ने Doodle बनाकर किया सम्मानित:

3 जनवरी 2020 को गूगल ने डूडल बनाकर देश की पहली महिला शिक्षिका को सम्मानित किया.

     भारत की पहली अध्यापिका को उनके 189 वें जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि और नमन.

1 COMMENT

  1. बेहतरीन सटीक लेख,
    आधुनिक बैज्ञानिक युग में भी इन घिर्णित सामाजिक कुरीतियों को किसी वर्ग विशेष /समुदाय का संरक्षण है, जो आने वाले समय में घातक और हिंसक हो सकता है l

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