shilpkar jati ka itihas और उनमें वर्गभेद/ जानें कहानी 3 नौलों की

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Shilpkar Jati ka Itihas (History of Shilpakar Caste)बहुत पुराना है.कई इतिहासकार सिंधु सभ्यता के निवासियों को भारत के मूलनिवासी मानते हैं.और आर्यों के आक्रमण के बाद सिन्धुसभ्यता नष्ट हो गयी.और भारत में आर्यों का अधिकार हो गया.धीरे-धीरे आर्यों ने अपनी नई संस्कृति का विकास किया .वैदिक कालीन संस्कृति आर्यों की ही देन है.यहीं से भारतीय समाज चार वर्गों में विभाजित हो गया.सबसे निचली पायदान पर शुद्र को रखा गया .

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     जाति व्यवस्था धीरे-धीरे और कठोर होती गयी और शूद्रों को अछूत ,अंत्यज्य, अश्पृश्य समझा जाने लगा.इन्हीं शूद्रों,अछूतों को महात्मा गांधी ने हरिजन नाम दिया(अब ये शब्द गैर संवैधानिक है).लेकिन शुद्र वर्ग ने अपने को हरिजन के स्थान पर पहले दलित और अबशिल्पकार कहलाना ज्यादा सम्मानजनक लगा.लेकिन भारतीय संविधान में इनके लिए अनुसूचित जाति(Scheduled caste) का प्रयोग किया गया है.

कुमाऊँ में Shilpkar jati ka Itihas:

कुमाऊँ में Shilpakar Jati ka Itihas से पहले हमको उत्तराखंड के साथ-साथ भारत की जातिव्यवस्था Cast system को समझना होगा.भारत का समाज 4 वर्गों में विभाजित था. ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र, और आज भी यही वर्गीकरण हिंदू समाज में प्रचलित है और व्याप्त है, इसी प्रकार उत्तराखंड की शिल्पकार जातियां भी चार वर्गो मे विभाजित थी और अभी भी ये अनवरत रूप से जारी है .

कुमाऊँ का इतिहास ,के लेखक बद्रीदत्त पांडे ने शिल्पकार वर्ग का विभाजन निम्नवत किया है.

प्रथम श्रेणी.

इस वर्ग में कोली,टम्टा, ओढ़ और लोहार आते हैं,इस प्रथम वर्ग के व्यवसाय भी अलग -अलग हैं.

कोली

कपड़े बुनने का काम,कताई करना इस जाति का प्रमुख व्यवसाय था.इनको घर -बुण (home -spew)कहा जाता था.मशीनों के आ जाने से उनका पारंपरिक काम खत्म हो गया है .अब ये लोग खेती करते हैं तथा जानवर पालते हैं.

   टम्टा:

  टम्टा जाति उत्तराखंड के शिल्पकारों सबसे उच्च जाति समझी जाती है.अगर ये कहा जाए कि टम्टा जाति शिल्पकारों में ब्राह्मण जाति है तो अतिश्योक्ति न होगी.

  ओढ़:

मकान की चिनाई करने वाले ओढ़ या राज मिस्त्री कहे जाते हैं.इस वर्ग के अंतर्गत बढ़ई,मिस्त्री, आदि शामिल हैं.

   बाड़े:

राजा ने देवी की पूजा में बलि चढ़ाने के लिए  भैंसों जे रखने की जगह का नाम बाड़ा रखा, उसका जिम्मेदार कर्मचारी बाड़े कहा जाता था उस जाति के लोग खानों से पत्थर निकालते थे.,

   लोहार:

 

इनको पहाड़ी भाषा मे ‘ल्वार’कहते हैं.ये लगभग हर गांव में पाए जाते हैं.इनको गांव में कमाने को जमीन भी मिलती है,और अनाज भी.

तिरूवा:

तीर बनाने वालों को तिरूवा कहा जाता था.ये भी लोहार वर्ग में आते हैं.

ढाड़ी:

ये प्रारंभ में “खस राजपूत”जाति के थे,जो किसी कारण अपनी जाति से जातिच्युत कर दिए गए और शूद्र की श्रेणी में रखे गए.(अठ-किन्सन)

द्वितीय वर्ग के Shilpakar jati ka itihas:

भूल:

विभिन्न प्रकार के बीजों से तेल निकालने वाले भूल कहे जाते थे.ये लोग तिल, लाई, सरसों आदि से तेल निकालते थे.ये कोल्हू चलाते थे. ये मुर्गी और सुवर पालते थे.

रूड़ीया शिल्पकार:

इस वर्ग के लोग बांस और रिंगाल से टोकरियां बनाते थे,जैसे डाले, सूप,कोरंगे चटाई आदि बनाते थे.बारूढ़ि तथा बाँसफोड़ भी इसी केटेगरी में आते हैं.

चिमड़िया shilpakar jati ka itihas

ये लोग लकड़ी के बर्तन बनाते हैं,जिनमें ठेके,पाले,फरुवे, नाली,पेंसरी आदि शामिल हैं.

पहरी

यह डेढ़ के गुड़ेत की तरह गांव के चौकीदार तथा प्रधान का दूत होता था.यह प्रधान के सब काम करता था.इसको कुछ जमीन मुप्त मिलती थी.use वह बेच नही सकता था.शूद्रों को सेवा के बदले जो जमीन दी जाती थी,वह खण्डेला कहलाती थी.

तीसरे समूह के Dalit jati ka itihas:

    चमार:

चमड़े से जूते आदि बनाने वाले तथा चमड़ा साफ व रंग करने वाले चमार जाति में रखे गए हैं.

    बखरिया:

ये शिल्पकार जाति उस वक्त के राजाओं के घोड़ों के सईस थे.

      धूना:

रुई साफ करने वाले को धुनकिया या धूना कहा जाता है.ये जाति अब शहरी क्षेत्रों में ही पाई जाती है.

   हनकिया:

मिट्टी के बर्तन बनाने वालों को हनकिया कहा जाता है.ये कुम्हार हैं.इनकी संख्या भी अब बहुत कम है.

चौथे पायदान के अछूत/दलित/ शिल्पकार:

इस वर्ग में घुम्मकड़ जाति आती है.जिनका विवरण निम्नवत है.

       बादी:

इस वर्ग के लोग  गांव का गवैया, बजैया तथा बाजीगर  होते हैं.ये गांव-गांव मांगने जाते हैं.ये कलाकार होते हैं.

       हुड़किया:

ये लोग ‘हुड़का’ बजाकर अपनी औरतों को नचाते हैं.

हुड़का

      ढोली:

यह जाति ढोल,नगाड़े और दमुवा बजाते हैं.शादी -व्याह में ये बाजीगरी का काम करते है.साथ ही मन्दिरों में भी बाजा बजाते हैं.और देवी -देवताओं को उतराते हैं.

shilpakar jati ka itihas ढोल एक वाद्ययंत्र है जिसको ढोली जाति के शिल्पकार बजाते हैं.

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   दरजी (Tailar master)

कपड़ा सिलने वालों को दरजी पुकारा जाता है.ये लोग घर-घर जाकर अनाज आदि जमा करते हैं.

      हलिया:

कुमाऊँ क्षेत्र में कुछ ब्राह्मण जाति के लोग खेतों में हल नहीं जोतते हैं,उनके खेतों को जोतने वाले भी हरिजन जाति(अब ये शब्द गैर कानूनी है लेकिन इतिहास की दृष्टि से उपयोग किया गया है) के लोग होते हैं.इनको हलिया कहा जाता है.

       ‘कुमाऊँ का इतिहास’ पुस्तक में बद्रीदत्त पांडे लिखते हैं-हलिया हल चलाने वाले को कहते हैं,वह सन 1840 तक जमीन के साथ या बिना जमीन बेचा जा सकता था.

शिल्पकारों के भी हैं अलग-अलग नौले :कैसे मिटेगा जतिवाद?

इतिहास चाहे कुछ भी बयां करे मगर आँखों देखी और सुनी बातें कभी सत्य से परे नहीं हो सकती.जितने नामकरण शूद्रों के किये गए उससे अधिक उनके अंदर भी उपजातियां व्याप्तहैं.शुद्र,अछूत,हरिजन,दलित,शिल्पकार आदि एक ही कौम होते हुए भी उनकी मानसिकता भी हिंदुत्व की वर्णव्यवस्था को जीवित रखे हुए है.कुमाऊँ के shilpakar jati ka itihas भी खुद वर्ग विभाजन का रहा है.यहां मैं एक सत्य घटना  का उल्लेख कर रहा हूं.

   पिथोरागढ़ जनपद में एक गांव ऐसा है जिसमें सवर्ण और दलित शिल्पकार कई वर्षों से निवास करते हैं.सवर्ण जाति में क्षत्रिय लोग वहां रहते हैं.खेत से खेत मिले है.एक जंगल है, एक ही स्कूल में  सभी  के बच्चे पढ़ते हैं.एक ही कल्चर है,एक ही प्रकार के त्योहार सब मनाते हैं,होली उनकी भी होती है और शिल्पकारों की भी.दीवाली इनकी भी होती है और उनकी भी.जाग-जागर,पूजा पाठ उधर भी है और इधर भी.एक सरकारी सस्ते गले की दुकान है,एक ही बिजली की लाइन है.मगर एक चीज ऐसी है जो उनके लिए अलग-अलग है,वो है प्रकृति की अनमोल देन पानी के नौले.पहले ही बताया गया है कि गांव में दो ही जातियां हैं सवर्ण और अछूत/शिल्पकार मगर पानी के तीन  नौले अलग -अलग हैं.

   क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि तीसरा नौला किनके लिए होगा?जी हां ये तीसरा नौला भी शिल्पकारों का ही था,मगर वे शिल्पकार तथाकथित ढोली(दास) उपजाति के थे.और दूसरे शिल्पकार कोली जाति के है.

कोली लोगों को ठाकुरों के नौले से पानी पीने का हक नहीं है,और दास लोगों को कोली लोगों के नौले से पानी पीने का हक नहीं.हम कहते हैं शिल्पकारों के साथ सवर्ण भेदभाव करते हैं,खुद शिल्पकार भी अपनी उपजातियों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसे सवर्ण अन्य दलितों के साथ करते हैं.

   बात सबक लेने की है, जब उस गांव के कोली लोग सवर्णों के नौले से पानी भरने की बात कहने लगे तो,उस गांव के सवर्ण व्यक्ति ने कहा  भाइयो पहले आप उनके नौले से पानी भरो और पियो,तब जाके भेदभाव मिटाने की बात करना.आज दलित समाज में सबसे बड़ी कमी यही है कि वे खुद अंधविश्वास,पाखण्ड और  वर्गभेद से जकड़े हुए हैं,जो उनकी एकता और संगठन,संघर्ष में बाधक है.

 

 

 

 

 

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