खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोविंद सिंह: क्या है 5 प्यारों की Big स्टोरी

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जनसांख्यकीय रूप से एक छोटे से समुदाय को उन्होंने इतना संगठित और मजबूत बना डाला कि बड़े-बड़े क़ौम और संप्रदाय उनके आगे घुटने टेक देते हैं. बैसाखी के दिन सन 1699 में गुरु गोविंद सिंह ने आनन्दपुर साहब में खालसा पंथ की स्थापना की थी.खालसा का शाब्दिक अर्थ होता है पवित्र और पंथ का अर्थ पथ या मार्ग.अपने 5 शिष्यों के साथ उन्होंने इस पंथ की स्थापना की थी.

“सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने एक ऐसे नए मार्ग की स्थापना की जिसने सिक्खों को विश्व में एक नई पहचान दिलाई. खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोविंद सिंह ने सिक्ख धर्म में संत परंपरा को सैनिक के रूप में तब्दील कर दिया.वे एक बेहतर संगठनकर्ता और कुशल नेतृत्व के धनी थे.उन्होंने सिक्खों को सिंह नाद में बदल दिया.

गोविंद सिंह का जीवन परिचय:

गुरु गोविंद सिंह के बचपन का नाम गोविंद राय था.इनके पिता गुरु तेगबहादुर थे,जो सिखों के 9वें गुरु थे.इनकी माता का नाम माता गुजरीथा .गुरु गोविंद सिंह का जन्म सन 1666 ई0 में पटना (बिहार) में हुवा था.जो आज पटना साहिब के नाम से सिखों का पवित्र धार्मिक स्थल है.सिख धर्म त्याग और बलिदान का प्रतीक है.अन्याय के खिलाफ और मानवता की रक्षा के लिए बलिदान होने वालों में सिख धर्म के लोग सबसे आगे रहे हैं.गुरु अर्जुन देव से लेकर अंतिम गुरु गोबिंद सिंह तक अपने संप्रदाय की रक्षा और स्वाभिमान के लिए शहीद हो गए.

खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोविंदसिंह।
खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोविंद सिंह

  गुरु गोविंद सिंह संस्कृत, पारसी  और पंजाबी भाषा के अच्छे विद्वान थे.वे एक कवि,साहित्यकार,दार्शनिक,आध्यत्मिक नेता,सैनिक और एक प्रखर,तेजस्वी वक्ता  भी थे.उन्होंने जो जोश और जज्बा अपने अनुयायियों में भरा ,आज भी स्पष्ट दिखाई देता है.

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क्या है खालसा पंथ?

गुरु गोविंद सिंह से पहले सिक्खों के 9 गुरु हुए.9 वें गुरु तेगबहादुर थे.जो दसवें गुरु गुरुगोविंद सिंह के पिता थे.जब गोविंद सिंह की उम्र महज 9 वर्ष की थी औरंगजेब ने उनके पिता गुरु तेगबहादुर का सर कलम कर दिया था.सत्रहवीं शताब्दी में औरंगजेब ने भारत में जुल्म की हदें पार कर रखी थीं.इस्लाम धर्म के अलावा अन्य धर्म खतरे में थे.हिंदुओं में आपसी फूट और ऊंच-नीच के कारण आसानी से धर्मान्तरण हो जाता था क्योंकि हिन्दू धर्म के दलित और आदिवासी हिन्दू धर्म में भी पीड़ित थे और भेदभाव के शिकार थे.

गुरु तेगबहादुर ने कश्मीरी पंडितों के धर्म को बचाने के लिए औरंगजेब के सामने इस्लाम धर्म कबूल करने से इनकार कर दिया था.क्योंकि उसने कश्मीरी पंडितों से यह शर्त रखी थी कि तुम कोई ऐसा बहादुर व्यक्ति को मेरे सामने लाओ जो इस्लाम धर्म कबूल करने से मना कर दे और अपना बलिदान दे दे,तो मैं तुमको मुसलमान नहीं बनाऊंगा.9 वर्ष के बालक गोविंद राय ने अपने पिता को ललकारा कि आप से ज्यादा बहादुर और साहसी कौन हो सकता है?

गुरु तेगबहादुर की हत्या (शहादत) के बाद गोविन्द राय सिक्खों के 10 वें गुरु बने.उन्होंने पूरी कौम को एक लड़ाकू सैनिकों के रूप में परिवर्तित कर दिया.सन 1699 ई0 में बैसाखी के दिन उन्होंने अपने 5 शिष्यों के साथ एक “खालसा पंथ” की नींव रखी.उनके इन 5 शिष्यों को पंच प्यारे कहा जाता है.उन्होंने दुधारी तलवार से लोहे के कटोरे में चीनी और पानी को घोला और अपने शिष्यो को पिलाया और खुद भी पिया.जिसको उन्होंने अमृत नाम दिया.पहले 5 खालसा बनाने के बाद वे छठे खालसा बने.गोविंद राय से वे गोविंद सिंह कहलाये.ज्ञात हो कि सिक्ख धर्म के लोगों में सिंह लिखने की परंपरा खालसा पंथ की स्थापना के बाद ही शुरू हुई.

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कौन थे पंच प्यारे जो पहले खालसा बने:

गुरु गोविंद सिंह ने जिन 5 व्यक्तियों को सबसे पहले कठिन परीक्षा लेकर अमृत छकाया था.तथा खालसा बनाया था,उनको पंच प्यारे कहा जाता है.ये पंच प्यारे थे-

  1. Daya Ram (Bhai Daya Singh),
  2. Dharam Das (Bhai Dharam Singh),
  3. Himmat Rai (Bhai Himmat Singh),
  4. Mohkam Chand (Bhai Mohkam Singh), and
  5. Sahib Chand (Bhai Sahib Singh).

सिक्ख धर्म के 10 गुरु:

क्या है सिख गुरुओं का इतिहास:एक झलक

1-गुरु नानक  1469-1538

2- गुरु अंगद 1538-1552

3- गुरु अमरदास 1552-1574

4- गुरु रामदास 1575-1581

5 -गुरु अर्जुन 1581-1606

6- गुरु हरगोविंद 1606-1645

7- गुरु हरराय 1646-1661

8- गुरु हरकिशन1661-1664

9- गुरु तेग बहादुर1664-1675

10- गुरु गोविंद सिंह.1675-1708

गुरु गोविंदसिंह का उदघोष:

गुरु गोविंद सिंह ने ऐसे खालसा की स्थापना की जो अन्याय से लड़ सके,सत्य के लिए बलिदान हो जाये,गरीबो की ,असहायों की रक्षा करे,और मानवता तथा भाईचारे का संदेश दे.उन्होंने जातिप्रथा पर चोट की,समानता और भेदभाव रहित समाज के निर्माण की कल्पना की.साथ ही उन्होंने ये भी सन्देश दिया कि जुल्म को खत्म करने के लिए अगर तलवार भी उठानी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए.उन्होंने सिखों के लिए 5 चीजें रखना जरूरी किया-केश,कृपाण,कच्छा,कंघा और कड़ा.

उनका सन्देश था-

चिड़ियों से मैं बाज

लडाऊ , गीदड़ों को मैं शेर बनाऊ !

सवा लाख से एक लडाऊ तभी गोबिंद सिंह नाम

कहउँ !!

इनके जन्म दिन को प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है.

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