बाबा साहेब डॉ अंबेडकर ने लड़ा एक ऐसा केश जज भी हो गये हैरान:

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भारत रत्न बाबा साहेब डॉ अंबेडकर का जीवन बचपन से लेकर महापरिनिर्वाण तक कांटों भरी राह से गुजरा.ये कांटे बिछाये थे हिंदुत्व की वर्णव्यवस्था और विषमताओं से भरे सामाजिक परंपराओं ने.बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर भी एक चट्टान की तरह अकेले ही लड़ते रहे,संघर्ष करते रहे.भारत रत्न ही नहीं वे विश्वरत्न थे.उनके द्वारा बनाया गया संविधान मानव जाति के कल्याण और उत्थान के लिए विश्वविख्यात है.कोलम्बिया विश्वविद्यालय अमेरिका ने उनको “SYMBOL OF KNOWLEDGE”की उपाधि देकर उनके विश्व व्यापी विद्वान होने की प्रमाणिकता पर मुहर लगाई है.

डॉ आंबेडकर का संघर्ष:

डॉ आंबेडकर बहुमुखी प्रतिभा के धनी  रहे हैं.महान अर्थशास्त्री,समाजशास्त्री,राजनेता,पत्रकार,संपादक,इतिहासकार, राजनीतिज्ञ,लेखक,चिंतक और समाज वैज्ञानिक रहे हैं,वे उतने ही निपुण और कुशल वकील भी रहे हैं.बीसवीं सदी भारत के लिए पुनर्जागरण और क्रांति की सदी रही है.अंग्रेजों की गुलामी तो सम्पूर्ण हिंदुस्तान झेल ही रह था,किंतु हिन्दूसमाज का एक ऐसा वर्ग भी है जो दोहरी गुलामी को झेल रहा था.(हिंदुत्व की गुलामी अब भी जारी है आजादी के सात दशक बाद भी).इस दबे,कुचले,पीड़ित,शोषित ,वंचित,पिछड़े और अछूत मानी जाने वाली जाति के प्रकाश पुंज बनकर डॉ बाबा साहेब भीमरावजी अंबेडकर जी नेतृत्व कर रहे थे.

बाबा साहेब डॉ अंबेडकर।
बाबा साहेब डॉ अंबेडकर

   बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर अछूतों की लड़ाई आजीवन लड़ते रहे.महाड़ सत्याग्रह, कालूराम मन्दिर प्रवेश,वायकॉम सत्याग्रह ,से लेकर कम्युनल अवार्ड तक उन्होंने संघर्ष किया.’कम्युनल अवार्ड’ को छीनने में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का योगदान भी कभी भुलाया नहीं जा सकता !कम्युनल अवार्ड के विरोध में हिंदूजीवियों ने गांधी को भरपूर समर्थन दिया.परिणामस्वरूप बाबा साहेब को 24 सितंबर 1932 को ‘पूना पैक्ट’ करने पर विवश होना पड़ा.

  आज के इस आर्टिकल में एक ऐसी घटना का उल्लेख होने वाला है,जिसको पढ़कर बाबा साहेब की विद्वत्ता का लोहा हर कोई मानेगा,चाहे वह अंबेडकरवादी हो या नहीं.घटना तीन दलित लेखकों से जुड़ी हुई है.

बाबा साहेब डॉ भीमरावजी आंबेडकर एक वकील के रूप में:

डॉ0 भीमराव अंबेडकर ने कमजोर वर्ग की हक की लड़ाई के लिए वकालत प्रारंभ की. वे अपनी वकालत बड़ी कुशलता से निभा रहे थे. इसी दौरान उनके पास एक मुकदमा आया इस मुकदमे के अंतर्गत ब्राह्मणों के द्वारा तीन दलितों पर मानहानि का दावा किया गया था .इन 3 दलितों का कसूर यह था कि उन्होंने हिंदुत्व जे अंदर छुवाछुत पर एक किताब लिखी थी, उस किताब के अंतर्गत यह दर्शाया गया था कि कुछ ब्राह्मणों ने राष्ट्र का नाश किया है और अपने राष्ट्र को विनाश की तरफ धकेल रहे हैं.

डॉ भीमराव अंबेडकर ने सबका ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि उन्होंने ही छुआछूत की बीमारी फैला रखी है उनकी दृष्टि में अछूत इंसान ही नहीं .

पुस्तक में यह भी लिखा था-” इन ब्राह्मणों की दृष्टि में अछूतों को जीने का अधिकार नहीं है, ये कुंए से पानी नहीं भरने देते, नल से भी पानी नहीं लेने देते, इनका कहना है कि कुआं और नल अपवित्र हो जाएंगे इस प्रकार दलितों की हालत इन्होंने बद से बदतर बना रखी है.

इन दलितों के द्वारा लिखी गई इस किताब में यह भी लिखा गया था :-“अछूतों के लिए यह कहा जाता है कि- उन्हें ऊंची जाति के लोगों के सामने नहीं आना चाहिए. वह सड़कों की सफाई सवेरा होने से पहले कर लें. अगर कोई ब्राह्मण उन्हें सामने से आता दिखाई दे तो उन्हें चाहिए कि वे सड़क पर लेट जाएं. ताकि ब्राह्मण को उसका चेहरा ना दिखाई पड़े क्योंकि ऐसा होने पर अपशकुन माना जाता”

डॉ बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने यह मुकदमा अपने हाथों में ले कर कम से कम पैसों में करने का फैसला किया. क्योंकि यह मुकदमा उनके लक्ष्य की ओर ले जाने में उनकी सहायता कर रहा था. यह तीनों व्यक्ति बड़े ही खुश नजर आ रहे थे मुकदमा न्यायालय में प्रारंभ हुआ मुकदमे की पहली सुनवाई में सबूतों को दाखिल किया गया ,और दूसरे दिन बहस हुई ,तथा तीसरे दिन तीनों दलितों ने अपनी- अपनी सफाई जज के सामने प्रस्तुत की.उनका कहना था कि यह पुस्तक लिखकर इन लोगों ने कोई भी अपराध नहीं किया है जो कुछ इस देश में हो रहा है वही सब इन्होंने इस पुस्तक में लिखा है.

न्यायालय मैं जिस दिन बहस की गई उस दिन डॉ भीमराव अंबेडकर ने जज को बताया -“सरकार मेरे मुवक्किल ने कोई भी कसूर नहीं किया है .वह देखना है उन्होंने किताब में जो कुछ भी लिखा है वह बिल्कुल सही है जैसा कि इस पुस्तक में लिखा गया है इसके प्रमाण आपको अपने आप मिल जाएंगे”

ये सुनकर अदालत में सन्नाटा छा गया. पांच ब्राह्मण कटघरे में खड़े थे उनका वकील खामोश खड़ा अंबेडकर की ओर देख रहा था. डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने अछूतों के मुकदमे की पैरवी कर रहे थे वह खामोश खड़े थे और उनकी जगह बड़े गौर से सुन रहे थे. पूरा केस ब्राह्मणों द्वारा मानहानि का मुकदमा चलाने वाले इन ब्राह्मणों का कहना था कि इन अछूत लेखकों को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए .क्योंकि इन्होंने ब्राह्मणों का अपमान किया है उन पर आरोप लगाकर उन को कलंकित करने की कोशिश की है.

डॉ भीमराव बाबासाहेब अंबेडकर ने जज साहब का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि “इन ब्राह्मणों ने अंधेर मचा रखी है यह अपने स्वार्थ को पूरा करते हैं इसलिए इन्हें अछूत बनाते हैं, और इनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं यह अच्छा हुआ कि यह पुस्तक लिखी गई जनता को भी पता लग जाना चाहिए कि ब्राह्मणों की लोक लीला क्या है? यह अछूतों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं उन्हें गिरना की दृष्टि से देखते हैं कदम कदम पर उनका अपमान किया जाता है “

डॉ भीमराव अंबेडकर आगे कहते हैं कि-” भारत का जितना भी धार्मिक साहित्य है वह अधिकांश ढोंग और पाखंड से भरा पड़ा है मेरे मुवक्किल ने कोई अपराध नहीं किया है इन्हें छोड़ देना चाहिए”

जज को बाबा साहेब डॉ अंबेडकर की बात अच्छी तरह भा गई. दूसरे दिन जज ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा- ‘ब्राह्मणों ने जो मानहानि का मुकदमा किया है वह इस किताब को लिखने वाले व्यक्तियों का कोई अपराध नहीं, बल्कि इस किताब के अंतर्गत जो भी लिखा या दर्शाया गया है, वह सब सत्य है. अंत में न्यायालय ने इन तीनों दलितों को बाइज्जत बरी कर दिया और यह भी कहा कि इन पर लगाए गए इल्जाम सभी झूठे हैं यह लोग सजा के काबिल नहीं है .

दलित लेखकों के छूटने के पश्चात दलित वर्ग में डॉक्टर भीमराव बाबासाहेब अंबेडकर के प्रति श्रद्धा उमड़ पड़ी और लोगों ने सोचा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को कुछ सम्मान देना चाहिए. इसलिए एक सभा की जाए और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को सभा में आमंत्रित किया जाए .वह दलितों के भगवान हैं और शायदअछूतों के उद्धार के लिए ही उनका जन्म हुआ है.

बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर के सम्मान के लिए मुंबई के निकट जिला कोलाबा में एक सभा का आयोजन किया गया. डॉ भीमराव अंबेडकर को निमंत्रण पत्र भेजा गया. उन्हें आने के लिए साथ में अग्रिम राशि भी भेजी गई. डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने इस सभा सम्मेलन में जाने का इरादा बना लिया. वह भी इसी मौके की तलाश में थे आज वही सुनहरा मौका उनके हाथ लग गया था इस मौके को वह अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे.

आज बाबा साहेब के कठिन संघर्ष से अछूतों में नई चेतना आयी है.131 सांसद आरक्षित सीटों से सांसद चुने जाते हैं,लेकिन ये सांसद मात्र राजनीतिक दलों के चमचे बनकर रह गए हैं


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